Ye Hum Par Lutf Kaisa ye Karam Kya | Ghazal | ये हम पर लुत्फ़ कैसा ये करम क्या

ये हम पर लुत्फ़ कैसा ये करम क्या
बदल डाले हैं अंदाज़-ए-सितम क्या

ज़माना हेच है अपनी नज़र में
ज़माने की ख़ुशी क्या और ग़म क्या

जब उस महफ़िल को हम कहते हैं अपना
फिर उस महफ़िल में फ़िक्र-ए-बेश-ओ-कम क्या

नज़र आती है दुनिया ख़ूब-सूरत
मेरे साग़र के आगे जाम ओ जम क्या

जबीं है बे-नियाज़-ए-कुफ़्र-ओ-ईमाँ
दर-ए-बुत-ख़ाना क्या सेहन-ए-हरम क्या

तेरी चश्म-ए-करम हो जिस की जानिब
उसे फिर इम्तियाज़-ए-बेश-ओ-कम क्या

मेरे माह-ए-मुनव्वर तेरे आगे
चराग़-ए-दैर क्या शम्मा-ए-हरम क्या

निगाह-ए-नाज़ के दो शोबदे हैं
'अज़ीज़' अपना वजूद अपना अदम क्या

Ye hum Par Litf Kaisa - Ghazal by Zafar Iqbal - English Font

ye ham par lutf kaisā ye karam kyā 
badal Daale haiñ andāz-e-sitam kyā 

zamāna hech hai apnī nazar meñ 
zamāne kī ḳhushī kyā aur ġham kyā 

jab us mahfil ko ham kahte haiñ apnā 
phir us mahfil meñ fikr-e-besh-o-kam kyā 

nazar aatī hai duniyā ḳhūb-sūrat 
mire sāġhar ke aage jām-o-jam kyā 

jabīñ hai be-niyāz-e-kufr-o-īmāñ 
dar-e-but-ḳhāna kyā sehn-e-haram kyā 

tirī chashm-e-karam ho jis kī jānib 
use phir imtiyāz-e-besh-o-kam kyā 

mire māh-e-munavvar tere aage 
charāġh-e-dair kyā sham-e-haram kyā 

nigāh-e-nāz ke do shobade haiñ 

'azīz' apnā vajūd apnā adam kyā 

Post a Comment

0 Comments