रात फिर आएगी, फिर ज़ेहन के दरवाज़े पर - ज़फ़र इक़बाल

1.

रात फिर आएगी, फिर ज़ेहन के दरवाज़े पर
कोई मेहँदी में रचे हाथ से दस्तक देगा

धूप है, साया नहीं आँख के सहरा में कहीं
दीद का काफिला आया तो कहाँ ठहरेगा

आहट आते ही निगाहों को झुका लो कि उसे
देख लोगे तो लिपटने को भी जी चाहेगा

2,

यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू न मिला
किसी को हम न मिले और हम को तू न मिला

ग़ज़ाल-ए-अश्क सर-ए-सुब्ह दूब-ए-मिज़गाँ पर
कब आँख अपनी खुली और लहू लहू न मिला

चमकते चाँद भी थे शहर-ए-शब के ऐवाँ में
निगार-ए-ग़म सा मगर कोई शम्मा-रू न मिला

उन्ही की रम्ज़ चली है गली गली में यहाँ
जिन्हें उधर से कभी इज़्न-ए-गुफ़्तुगू न मिला

फिर आज मय-कदा-ए-दिल से लौट आए हैं
फिर आज हम को ठिकाने का हम-सबू न मिला

3.

ख़ुशी मिली तो ये आलम था बद-हवासी का
के ध्यान ही न रहा ग़म की बे-लिबासी का

चमक उठे हैं जो दिल के कलस यहाँ से अभी
गुज़र हुआ है ख़यालों की देव-दासी का

गुज़र न जा यूँही रुख़ फेर कर सलाम तो ले
हमें तो देर से दावा है रू-शनासी का

ख़ुदा को मान के तुझ लब के चूमने के सिवा
कोई इलाज नहीं आज की उदासी का

गिरे पड़े हुए पत्तों में शहर ढूँढता है
अजीब तौर है इस जंगलों के बासी का

4.

खींच लाई है यहाँ लज़्ज़त-ए-आज़ार मुझे
जहाँ पानी न मिले आज वहाँ मार मुझे

धूप ज़ालिम ही सही जिस्म तवाना है अभी
याद आएगा कभी साया-ए-अश्जार मुझे

साल-हा-साल से ख़ामोश थे गहरे पानी
अब नज़र आए हैं आवाज़ के आसार मुझे

बाग़ की क़ब्र पे रोते हुए देखा था जिसे
नज़र आया वही साया सर-ए-दीवार मुझे

गिर के सद पारा हुआ अब्र में अटका हुआ चाँद
सर पे चादर सी नज़र आई शब-ए-तार मुझे

साँस में था किसी जलते हुए जंगल का धुवाँ
सैर-ए-गुलज़ार दिखाते रहे बे-कार मुझे

रात के दश्त में टूटी थी हवा की ज़ंजीर
सुब्ह महसूस हुई रेत की झंकार मुझे

वही जामा के मेरे तन पे न ठीक आता था
वही इनाम मिला आक़िबत-ए-कार मुझे

जब से देखा है 'ज़फर' ख़्वाब-ए-शाबिस्तान-ए-ख़याल
बिस्तर-ए-ख़ाक पे सोना हुआ दुश्वार मुझे

जहाँ मेरे न होने का निशाँ फैला हुआ है
समझता हूँ ग़ुबार-ए-आसमाँ फैला हुआ है

मैं इस को देखने और भूल जाने में मगन हूँ
मेरे आगे जो ये ख़्वाब-ए-रवाँ फैला हुआ है

इन्ही दो हैरतों के दरमियाँ मौजूद हूँ मैं
सर-ए-आब-ए-यक़ीं अक्स-ए-गुमाँ फैला हुआ है

रिहाई की कोई सूरत निकलनी चाहिए अब
ज़मीं सहमी हुई है और धुवाँ फैला हुआ है

कोई अंदाज़ा कर सकता है क्या इस का के आख़िर
कहाँ तक साया-ए-अहद-ए-ज़ियाँ फैला हुआ है

कहाँ डूबे किधर उभरे बदन की नाव देखें
के इतनी दूर तक दरिया-ए-जाँ फैला हुआ है


मैं दिल से भाग कर जा भी कहाँ सकता हूँ आख़िर
मेरे हर सू ये दश्त-ए-बे-अमाँ फैला हुआ है

मुझे कुछ भी नहीं मालूम और अन्दर ही अन्दर
लुहू में एक दस्त-ए-राएगाँ फैला हुआ है

'ज़फ़र' अब के सुख़न की सर-ज़मीं पर है ये मौसम
बयाँ ग़ाएब है और रंग-ए-बयाँ फैला हुआ है

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