रात यूँ दिल में तेरी खोयी हुई याद आयी - नुसरत फ़तेह अली खान

शायर - फैज़ अहमद फैज़ 

रात यूँ दिल में तेरी खोयी हुई याद आयी
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाये
जैसे सहराओं में हौले से चले बादे-नसीम 
जैसे बीमार को बे-वजह करार आ जाए 

कितनी बदल गए हैं वो हालात की तरह 
जब भी मिले हैं पहली मुलाकात की तरह 
तेरी ज़फ़ा कहूं या इनायत कहूं इसे 
गम भी मिला मुझे किसी सौगात की तरह

दिल में ग़मों की आग भड़कने लगी तो हम 
रोये हैं फूट फूट के बरसात की तरह 
हम क्या किसी के हुस्न का सदका उतारते 
एक ज़िन्दगी मिली है वो खैरात की तरह 

बुझी हुई शम्मा का धुंआ हूँ 
और अपने मर्कज को जा रहा हूँ
कि दिल की हसरत तो मिट चुकी है 
अब अपनी हस्ती मिटा रहा हूँ 

तेरी ही सूरत के देखने को 
बुतों की तस्वीरें ला रहा हूँ 
कि खूबियाँ सब की ज़मा कर के 
तेरा तसव्वुर जमा रहा हूँ 

कफ़न में खुद को छुपा लिया है 
के तुझको पर्दे की हो न ज़हमत 
नकाब अपने लिए बना कर 
हिजाब तेरा उठा रहा हूँ 

उधर वो घर से निकल पड़े हैं
इधर मेरा दम निकल रहा है 
इलाही कैसी है ये क़यामत 
वो आ रहे हैं मैं जा रहा हूँ

मोहब्बत इंसान की है फितरत 
कहाँ है इमकाम-ए-तर्क-ए-उल्फत 
वो और भी याद आ रहे हैं
मैं उनको जितना भुला रहा हूँ 

रोज़ कहता हूँ भूल जाऊं उन्हें 
रोज़ ये बात भूल जाता हूँ 
नहीं आती तो उनकी याद 
बरसो तक नहीं आती 
मगर जब याद आते हैं 
तो अक्सर याद आते हैं 

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