12 August, 2016

अमीर मिनाई के तीन ग़ज़ल

ग़ज़ल - हँस के फ़रमाते हैं वो देख कर हालत मेरी  
गायक - रूप कुमार राठोड 

हँस के फ़रमाते हैं वो देख कर हालत मेरी
क्यों तुम आसान समझते थे मुहब्बत मेरी

बाद मरने के भी छोड़ी न रफ़ाक़त मेरी
मेरी तुर्बत से लगी बैठी है हसरत मेरी

मैंने आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी खेंचा तो कहा
पिस गई पिस गई बेदर्द नज़ाकत मेरी

आईना सुबह-ए-शब-ए-वस्ल जो देखा तो कहा
देख ज़ालिम ये थी शाम को सूरत मेरी

यार पहलू में है तन्हाई है कह दो निकले
आज क्यों दिल में छुपी बैठी है हसरत मेरी

हुस्न और इश्क़ हमआग़ोश नज़र आ जाते
तेरी तस्वीर में खिंच जाती जो हैरत मेरी

किस ढिटाई से वो दिल छीन के कहते हैं 'अमीर'
वो मेरा घर है रहे जिस में मुहब्बत मेरी




ग़ज़ल - झोंका इधर न आये नसीम-ए-बहार का 

झोंका इधर न आये नसीम-ए-बहार का
नाज़ुक बहुत है फूल चराग़-ए-मज़ार का

फिर बैठे-बैठे वाद-ए-वस्ल उस ने कर लिया
फिर उठ खड़ा हुआ वही रोग इन्तज़ार का

शाख़ों से बर्ग-ए-गुल नहीं झड़ते हैं बाग़ में
ज़ेवर उतार रहा है उरूस-ए-बहार का

हर गुल से लालाज़ार में ये पूछता हूँ मैं
तू ही पता बता दे दिल-ए-दाग़दार का

इस प्यार से फ़िशार दिया गोर-ए-तंग ने
याद आ गया मज़ा मुझे आग़ोश-ए-यार का

हिलती नहीं हवा से चमन में ये डालियाँ
मूँह चूमते हैं फूल उरूस-ए-बहार का

उठता है नज़अ में वो सरहाने से ऐ 'अमीर'
मिटता है आसरा दिल-ए-उम्मीदवार का


ग़ज़ल - कह रही है हश्र में वो आँख शर्माई हुई 

कह रही है हश्र में वो आँख शर्माई हुई
हाय कैसे इस भरी महफ़िल में रुसवाई हुई

आईने में हर अदा को देख कर कहते हैं वो
आज देखा चाहिये किस किस की है आई हुई

कह तो ऐ गुलचीं असीरान-ए-क़फ़स के वास्ते
तोड़ लूँ दो चार कलियाँ मैं भी मुर्झाई हुई

मैं तो राज़-ए-दिल छुपाऊँ पर छिपा रहने भी दे
जान की दुश्मन ये ज़ालिम आँख ललचाई हुई

ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा सब में हया का है लगाव
हाए रे बचपन की शोख़ी भी है शर्माई हुई

वस्ल में ख़ाली रक़ीबों से हुई महफ़िल तो क्या
शर्म भी जाये तो जानूँ के तन्हाई हुई

गर्द उड़ी आशिक़ की तुर्बत से तो झुँझला के कहा
वाह सर चढ़ने लगी पाँओं की ठुकराई हुई

फिराक गोरखपुरी - कहकशां

एल्बम - कहकशां 

ग़ज़ल - अब अक्सर चुप से रहते हैं 
गायक - जगजीत सिंह 

अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं यूं ही कभू लब खोले हैं
पहले “फ़िराक़” को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं

दिन में हम को देखने वालों अपने अपने हैं औक़ाब
जाओ न तुम इन ख़ुश्क आँखों पर हम रातों को रो ले हैं

फ़ितरत मेरी इश्क़-ओ-मोहब्बत क़िस्मत मेरी तन्हाई
कहने की नौबत ही न आई हम भी कसू के हो ले हैं

बाग़ में वो ख्वाब-आवर आलम मौज-ए-सबा के इशारों पर
ड़ाली ड़ाली नौरस पत्ते सहस सहज जब ड़ोले हैं

उफ़ वो लबों पर मौज-ए-तबस्सुम जैसे करवटें लें कौंदें
हाय वो आलम जुम्बिश-ए-मिज़गां जब फ़ितने पर तोले हैं

इन रातों को हरीम-ए-नाज़ का इक आलम होये है नदीम
खल्वत में वो नर्म उंगलियां बंद-ए-क़बा जब खोले हैं

ग़म का फ़साना सुनने वालों आखिर-ए-शब आराम करो
कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे हम भी ज़रा अब सो ले हैं

हम लोग अब तो पराये से हैं कुछ तो बताओ हाल-ए-“फ़िराक़”
अब तो तुम्हीं को प्यार करे हैं अब तो तुम्हीं से बोले हैं


ग़ज़ल - किसी का यूँ तो हुआ
गायक - जगजीत सिंह



किसी का यूं तो हुआ कौन उम्रभर फिर भी
ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोखा है सब मगर फिर भी

हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
नई नई सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी

तेरी निगाह से बचने में उम्र गुज़री है
उतर गया रग-ए-जां में ये नेशतर फिर भी




ग़ज़ल - ग़ज़ल का साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात
गायक - जगजीत सिंह


ग़ज़ल का साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात
नवा-ए-मीर सुनाओ बड़ी उदास है रात

नवा-ए-दर्द में इक ज़िंदगी तो होती है
नवा-ए-दर्द सुनाओ बड़ी उदास है रात

उदासियों के जो हमराज़-ओ-हमनफ़स थे कभी
उन्हें ना दिल से भुलाओ बड़ी उदास है रात

जो हो सके तो इधर की राह भूल पड़ो
सनमक़दे की हवाओं बड़ी उदास है रात

कहें न तुमसे तो फ़िर और किससे जाके कहें
सियाह ज़ुल्फ़ के सायों बड़ी उदास है रात

अभी तो ज़िक्र-ए-सहर दोस्तों है दूर की बात
अभी तो देखते जाओ बड़ी उदास है रात

दिये रहो यूं ही कुछ देर और हाथ में हाथ
अभी ना पास से जाओ बड़ी उदास है रात

सुना है पहले भी ऐसे में बुझ गये हैं चिराग़
दिलों की ख़ैर मनाओ बड़ी उदास है रात

समेट लो कि बड़े काम की है दौलत-ए-ग़म
इसे यूं ही न गंवाओ बड़ी उदास है रात

इसी खंडहर में कहीं कुछ दिये हैं टूटे हुए
इन्ही से काम चलाओ बड़ी उदास है रात

दोआतिशां न बना दे उसे नवा-ए-‘फ़िराक़’
ये साज़-ए-ग़म न सुनाओ बड़ी उदास है रात

कहकशां - मखदूम मोहिउद्दीन

एल्बम - कहकशां 

ग़ज़ल - रात भर दीदा-ए-गम 
गायक - जगजीत सिंह 

रात भर दीदा-ए-ग़म नाक में लहराते रहे
सांस की तरह से आप आते रहे जाते रहे

खुश थे हम अपनी तमन्नाओं का ख़्वाब आएगा
अपना अरमान बर-अफ़्गंदा नक़ाब आएगा

नज़रें नीची किये शर्माए हुए आएगा
काकुलें चेहरे पे बिखराए हुए आएगा

आ गई थी दिल-ए-मुज़्तर में शकेबाई सी
बज रही थी मेरे ग़मखाने में शहनाई सी

शब के जागे हुए तारों को भी नींद आने लगी
आप के आने की इक आस थी अब जाने लगी

सुबह ने सेज से उठते हुए ली अंगड़ाई
ओ सबा तू भी जो आई तो अकेले आई

मेरे महबूब मेरी नींद उड़ानेवाले
मेरे मसजूद मेरी रूह पे छानेवाले

आ भी जा ताकि मेरे सजदों का अरमां निकले




गायक - जगजीत सिंह
इश्क़ के शोले को भड़काओ कि कुछ रात कटे
दिल के अंगारे को दहकाओ कि कुछ रात कटे

हिज्र में मिलने शब-ए-माह के गम आये हैं
चारासाजों को भी बुलवाओ कि रात कटे

कोई जलता ही नहीं कोई पिघलता ही नहीं
मोम बन जाओ पिघल जाओ कि कुछ रात कटे

चश्म-ओ-रुखसार के अज़गार को जारी रखो
प्यार के नग़मे को दोहराओ कि कुछ रात कटे

आज हो जाने दो हर एक को बद्-मस्त-ओ-ख़राब
आज एक एक को पिलवाओ कि कुछ रात कटे

कोह-ए-गम और गराँ और गराँ और गराँ
गमज़दों तेश को चमकाओ कि कुछ रात कटे





गायक - जगजीत सिंह


एक चमेली के मंड़वे तले
मैकदे से ज़रा दूर
उस मोड़पर…
दो बदन…
दो बदन……

दो बदन प्यार की आग में जल गए
प्यार हर्फ़-ए-वफ़ा
प्यार उनका ख़ुदा
प्यार उनकी चिता
दो बदन…
दो बदन……

दो बदन प्यार की आग में जल गए
ओस में भीगते चांदनी में नहाते हुए
जैसे दो ताज़ा रु ताज़ा दम फूल पिछले पहर
ठंड़ी ठंड़ी सुबुक रौ चमन की हवा सर्फ़-ए-मातम हुई
काली काली लटों से लिपट गर्म रुख़सार पर एक पल के लिये रुक गई

हमने देखा उन्हे
दिन में और रात में
नूर-ओ-ज़ुल्मात में
दो बदन…
दो बदन……
दो बदन प्यार की आग में जल गए

मस्जिदों के मुनारों ने देखा उन्हे
मंदिरों के किवड़ों ने देखा उन्हे
मैकदे की दरारों ने देख उन्हे
दो बदन…
दो बदन……
दो बदन प्यार की आग में जल गए

अज़ अज़ल ता अबद
ये बता चाराग़र
तेरी ज़ंबील में
नुस्ख़ा-ए-कीमिया-ए-मोहब्बत भी है
कुछ इलाज-ओ-दावा-ए-उल्फ़त भी है
दो बदन…
दो बदन……
दो बदन प्यार की आग में जल गए
दो बदन प्यार की आग में जल गए
दो बदन प्यार की आग में जल गए





गायक - जगजीत सिंह 


30 June, 2016

बाबा नागार्जुन की चार कवितायें

जनकवि बाबा नागार्जुन के जन्मदिन पर उनकी कुछ कवितायें - 




गोर्की मखीम!
श्रमशील जागरूक जग के पक्षधर असीम!
घुल चुकी है तुम्हारी आशीष
एशियाई माहौल में
दहक उठा है तभी तो इस तरह वियतनाम ।
अग्रज, तुम्हारी सौवीं वर्षगांठ पर
करता है भारतीय जनकवि तुमको प्रणाम ।


गोर्की मखीम!
विपक्षों के लेखे कुलिश-कठोर, भीम
श्रमशील जागरूक जग के पक्षधर असीम!
गोर्की मखीम!


दर-असल'सर्वहारा-गल्प' का
तुम्हीं से हुआ था श्रीगणेश
निकला था वह आदि-काव्य
तुम्हारी ही लेखनी की नोंक से
जुझारू श्रमिकों के अभियान का...
देखे उसी बुढ़िया ने पहले-पहल
अपने आस-पास, नई पीढी के अन्दर
विश्व क्रान्ति,विश्व शान्ति, विश्व कल्याण ।
'मां' की प्रतिमा में तुम्ही ने तो भरे थे प्राण ।

गोर्की मखीम!
विपक्षों के लेखे कुलिश-कठोर, भीम
श्रमशील जागरूक जग के पक्षधर असीम!

गोर्की मखीम!

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वो गया
वो गया
बिल्कुल ही चला गया
पहाड़ की ओट में

लाल-लाल गोला सूरज का
शायद सुबह-सुबह
दीख जाए पूरब में
शायद कोहरे में न भी दीखे !
फ़िलहाल वो
डूबता-डूबता दीख गया !
दिनान्त का आरक्त भास्कर
जेठ के उजले पाख की नौवीं साँझ
पसारेगी अपना आँचल अभी-अभी
हिम्मत न होगी तमिस्रा को
धरती पर झाँकने की !
सहमी-सहमी-सी वो प्रतीक्षा करेगी
उधर, उस ओर
खण्डहर की ओट में !
जी हाँ, परित्यक्त राजधानी के
खण्डहरोंवाले उन उदास झुरमुटों में
तमिस्रा करेगी इन्तज़ार
दो बजे रात तक
यानि तिथिक्रम के हिसाब से,
आधी धुली चाँदनी
तब तक खिली रहेगी
फिर, तमिस्रा का नम्बर आएगा !
यानि अन्धकार का !

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सुबह-सुबह
तालाब के दो फेरे लगाए

सुबह-सुबह
रात्रि शेष की भीगी दूबों पर
नंगे पाँव चहलकदमी की

सुबह-सुबह
हाथ-पैर ठिठुरे, सुन्न हुए
माघ की कड़ी सर्दी के मारे

सुबह-सुबह
अधसूखी पतइयों का कौड़ा तापा
आम के कच्चे पत्तों का
जलता, कड़ुवा कसैला सौरभ लिया

सुबह-सुबह
गँवई अलाव के निकट
घेरे में बैठने-बतियाने का सुख लूटा

सुबह-सुबह
आंचलिक बोलियों का मिक्स्चर
कानों की इन कटोरियों में भरकर लौटा
सुबह-सुबह

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झुकी पीठ को मिला
किसी हथेली का स्पर्श
तन गई रीढ़


महसूस हुई कन्धों को
पीछे से,
किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसें
तन गई रीढ़

कौंधी कहीं चितवन
रंग गए कहीं किसी के होठ
निगाहों के ज़रिये जादू घुसा अन्दर
तन गई रीढ़

गूँजी कहीं खिलखिलाहट
टूक-टूक होकर छितराया सन्नाटा
भर गए कर्णकुहर
तन गई रीढ़

आगे से आया
अलकों के तैलाक्त परिमल का झोंका
रग-रग में दौड़ गई बिजली
तन गई रीढ़



29 June, 2016

NH 10

फिल्म-  NH 10
गाना- काँच की नींद आई (kaanch ki neend aayi)
संगीतकार- संजीव दर्शन
गीतकार- कुमार 
गायक- कनिका कपूर, दीपांशु पंडित



काँच की नींद आई
पत्थर के ख्वाब लाई
काँच की नींद आई
पत्थर के ख्वाब लाई
जाने रब जाने कब
ज़ख्मो से मिल गए नैना

छिल गए नैना – 8

चिट्ठी जावे न जावे संदेसा
सजन गयो किस देस
टूटे दिल की जग भी नहीं सुनता
ना ही सुने दरवेश
टुकड़ा-टुकड़ा इन साँसों का
सीने में है बिखरा पड़ा
टुकड़ा-टुकड़ा इन साँसों का
सीने में है बिखरा पड़ा
सूखा हुआ समंदर
है आँखों के अन्दर
धड़कन चलेगी कैसे
दिल में चुभे है खंज़र
दिन काले-काले लगे
लगती है काली-काली रैना

छिल गए नैना -8

काँच की नींद आई
पत्थर के ख्वाब लाई
काँच की नींद आई
पत्थर के ख्वाब लाई
जाने रब जाने कब
ज़ख्मो से मिल गए नैना

छिल गए नैना -8


28 June, 2016

गमन

फिल्म - गमन (१९७८)
गाना - 
सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान सा क्यों है
संगीतकार - 
जयदेव,
गीतकार - 
शहरयार,
गायक -  सुरेश वाडकर,

सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान सा क्यों है
सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान सा क्यों है
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है

सीने में जलन

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूंढें
दिल है तो
दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूंढें
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सा क्यों है
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सा क्यों है

सीने में जलन

तनहाई की ये कौन-सी मंज़िल है रफीकों
तनहाई की
तनहाई की ये कौन-सी मंज़िल है रफीकों
ता-हद-ए-नजर एक बयाबान सा क्यों है
ता-हद-ए-नजर एक बयाबान सा क्यों है

सीने में जलन

क्या कोई नयी बात नज़र आती है हम में
क्या कोई
क्या कोई नयी बात नज़र आती है हम में
आईना हमे देख के हैरान सा क्यों है
आईना हमे देख के हैरान सा क्यों है

सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान सा क्यों है
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है

सीने में जलन