18 September, 2016

एयरलिफ्ट

फिल्म- एयरलिफ्ट (2016)
गाना- सोच न सके
संगीतकार- अमाल मालिक
गीतकार- कुमार
गायक- अरिजीत सिंह, तुलसी कुमार 


तेनु इतना मैं प्यार करां
इक पल विच सौ बार करां
तू जावे जे मैनू छड के
मौत दा इंतज़ार करां

के तेरे लिए दुनिया छोड़ दी है
तुझपे ही सांस आके रुके
मैं तुझको कितना चाहता हूँ
ये तू कभी सोच ना सके
तेरे लिए दुनिया छोड़ दी है
तुझपे ही सांस आके रुके
मैं तुझको कितना चाहता हूँ
ये तू कभी सोच ना सके
कुछ भी नहीं है ये जहां
तू है तो है इसमें ज़िन्दगी
कुछ भी नहीं है ये जहां
तू है तो है इसमें ज़िन्दगी
अब मुझको जाना है कहाँ
के तू ही सफ़र है आख़िरी
के तेरे बिना जीना मुमकिन नहीं
ना देना कभी मुझको तू फ़ासले
मैं तुझको कितना चाहती हूँ
ये तू कभी सोच ना सके
तेरे लिए दुनिया छोड़ दी है
तुझपे ही सांस आके रुके
मैं तुझको कितना चाहता हूँ
ये तू कभी सोच ना सके
आँखों की है यह ख्वाहिशें
की चेहरे से तेरे  न हटें
नींदों में मेरी बस तेरे
ख्वाबों ने ली है करवटें
की तेरी ओर मुझको लेके चलें
ये दुनिया भर के सब रास्ते
मैं तुझको कितना चाहता हूँ
ये तू कभी सोच न सके
तेरे लिए दुनिया छोड़ दी है
तुझपे ही सांस आके रुके
मैं तुझको कितना चाहता हूँ
ये तू कभी सोच न सके


14 September, 2016

मातृभाषा


निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।

अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।

उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय।

इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।

तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।

भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।

सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।

09 September, 2016

क्योंकि इतना प्यार तुमसे...

फिल्म: क्योंकि (2005)
गाना- क्योंकि इतना प्यार तुमसे करते हैं हम 
संगीत: हिमेश रेशमिया
गीत: समीर
गायक: अलका याज्ञनिक , उदित नारायण



क्योंकि इतना प्यार तुमको करते हैं हम
क्या जां लोगे हमारी सनम

क्योंकि इतना प्यार तुमको करते हैं हम
क्योंकि इतना प्यार तुमको करते हैं हम
क्या जां लोगे हमारी सनम

क्योंकि इतना प्यार तुमको करते हैं हम
क्या जां लोगे हमारी सनम
क्योंकि इतना प्यार तुमको करते हैं हम

हमारे दिल की तुम थोड़ी सी कदर कर लो
हम तुम पे मरते हैं, थोड़ी सी फिकर कर लो
फिकर कर लो
क्योंकि इतना प्यार तुमको करते हैं हम
क्या जां लोगे हमारी सनम
क्योंकि इतना प्यार तुमको करते हैं हम

तूने ओ जाना दीवाना किया है
दीवाना किया इस कदर
दीवाना किया इस कदर
चाहत में तेरी भुलाया जहां को
ना दिल को किसी की खबर
ना दिल को किसी की खबर
रगों में मोहब्बत का, अहसास ज़रा भर लो
हम तुम पे मरते हैं, थोड़ी सी फिकर कर लो
फिकर कर लो

क्योंकि इतना प्यार तुमको करते हैं हम
क्या जां लोगे हमारी सनम
क्योंकि इतना प्यार तुमको करते हैं हम

तुमसे हैं साँसें, तुम्हीं से है धड़कन
तुम्हीं से है दीवानगी
तुम्हीं से है दीवानगी
रब ने हमें दी है जाने तमन्ना तुम्हारे लिए ज़िंदगी
तुम्हारे लिए ज़िंदगी
वादा संग जीने का, तुम जाने-जिगर कर लो
हम तुम पे मरते हैं, थोड़ी सी फिकर कर लो
फिकर कर लो

क्योंकि इतना प्यार तुमको करते हैं हम
क्या जां लोगे हमारी सनम
क्योंकि इतना प्यार तुमको करते हैं हम
क्या जां लोगे
क्या जां लोगे
क्या जां लोगे
क्या जां लोगे हमारी सनम



08 September, 2016

पीनाज़ मसानी




जब मेरी याद सताए तो मुझे ख़त लिखना
जब मेरी याद सताए तो मुझे ख़त लिखना
तुम को जब नींद न आए तो मुझे ख़त लिखना
जब मेरी याद सताए तो मुझे ख़त लिखना

नीले पेड़ों की घनी छाँव में हँसता सावन,
प्यासी धरती में समाने को तरसता सावन,
रात भर छत पे लगातार बरसता सावन,
दिल में जब आग लगाए तो
दिल में जब आग लगाए तो मुझे ख़त लिखना
तुम को जब नींद न आए तो मुझे ख़त लिखना

जब फड़क उठे किसी शाख़ पे पत्ता कोई,
गुदगुदाए तुम्हें बीता हुआ लम्हा कोई,
जब मेरी याद का बेचैन सफ़ीना कोई,
जी को रह-रह के जलाए तो
जी को रह-रह के जलाए तो मुझे ख़त लिखना
तुम को जब नींद न आए तो मुझे ख़त लिखना

जब निगाहों के लिये कोई नज़ारा न रहे,
चाँद छिप जाए गगन पर कोई तारा  न रहे,
भरे संसार में जब कोई सहारा न रहे
लोग हो जाएँ पराए तो
लोग हो जाएँ पराए तो मुझे ख़त लिखना
तुम को जब नींद न आए तो मुझे ख़त लिखना
जब मेरी याद सताए तो मुझे ख़त लिखना



12 August, 2016

अमीर मिनाई के तीन ग़ज़ल

ग़ज़ल - हँस के फ़रमाते हैं वो देख कर हालत मेरी  
गायक - रूप कुमार राठोड 

हँस के फ़रमाते हैं वो देख कर हालत मेरी
क्यों तुम आसान समझते थे मुहब्बत मेरी

बाद मरने के भी छोड़ी न रफ़ाक़त मेरी
मेरी तुर्बत से लगी बैठी है हसरत मेरी

मैंने आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी खेंचा तो कहा
पिस गई पिस गई बेदर्द नज़ाकत मेरी

आईना सुबह-ए-शब-ए-वस्ल जो देखा तो कहा
देख ज़ालिम ये थी शाम को सूरत मेरी

यार पहलू में है तन्हाई है कह दो निकले
आज क्यों दिल में छुपी बैठी है हसरत मेरी

हुस्न और इश्क़ हमआग़ोश नज़र आ जाते
तेरी तस्वीर में खिंच जाती जो हैरत मेरी

किस ढिटाई से वो दिल छीन के कहते हैं 'अमीर'
वो मेरा घर है रहे जिस में मुहब्बत मेरी




ग़ज़ल - झोंका इधर न आये नसीम-ए-बहार का 

झोंका इधर न आये नसीम-ए-बहार का
नाज़ुक बहुत है फूल चराग़-ए-मज़ार का

फिर बैठे-बैठे वाद-ए-वस्ल उस ने कर लिया
फिर उठ खड़ा हुआ वही रोग इन्तज़ार का

शाख़ों से बर्ग-ए-गुल नहीं झड़ते हैं बाग़ में
ज़ेवर उतार रहा है उरूस-ए-बहार का

हर गुल से लालाज़ार में ये पूछता हूँ मैं
तू ही पता बता दे दिल-ए-दाग़दार का

इस प्यार से फ़िशार दिया गोर-ए-तंग ने
याद आ गया मज़ा मुझे आग़ोश-ए-यार का

हिलती नहीं हवा से चमन में ये डालियाँ
मूँह चूमते हैं फूल उरूस-ए-बहार का

उठता है नज़अ में वो सरहाने से ऐ 'अमीर'
मिटता है आसरा दिल-ए-उम्मीदवार का


ग़ज़ल - कह रही है हश्र में वो आँख शर्माई हुई 

कह रही है हश्र में वो आँख शर्माई हुई
हाय कैसे इस भरी महफ़िल में रुसवाई हुई

आईने में हर अदा को देख कर कहते हैं वो
आज देखा चाहिये किस किस की है आई हुई

कह तो ऐ गुलचीं असीरान-ए-क़फ़स के वास्ते
तोड़ लूँ दो चार कलियाँ मैं भी मुर्झाई हुई

मैं तो राज़-ए-दिल छुपाऊँ पर छिपा रहने भी दे
जान की दुश्मन ये ज़ालिम आँख ललचाई हुई

ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा सब में हया का है लगाव
हाए रे बचपन की शोख़ी भी है शर्माई हुई

वस्ल में ख़ाली रक़ीबों से हुई महफ़िल तो क्या
शर्म भी जाये तो जानूँ के तन्हाई हुई

गर्द उड़ी आशिक़ की तुर्बत से तो झुँझला के कहा
वाह सर चढ़ने लगी पाँओं की ठुकराई हुई

फिराक गोरखपुरी - कहकशां

एल्बम - कहकशां 

ग़ज़ल - अब अक्सर चुप से रहते हैं 
गायक - जगजीत सिंह 

अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं यूं ही कभू लब खोले हैं
पहले “फ़िराक़” को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं

दिन में हम को देखने वालों अपने अपने हैं औक़ाब
जाओ न तुम इन ख़ुश्क आँखों पर हम रातों को रो ले हैं

फ़ितरत मेरी इश्क़-ओ-मोहब्बत क़िस्मत मेरी तन्हाई
कहने की नौबत ही न आई हम भी कसू के हो ले हैं

बाग़ में वो ख्वाब-आवर आलम मौज-ए-सबा के इशारों पर
ड़ाली ड़ाली नौरस पत्ते सहस सहज जब ड़ोले हैं

उफ़ वो लबों पर मौज-ए-तबस्सुम जैसे करवटें लें कौंदें
हाय वो आलम जुम्बिश-ए-मिज़गां जब फ़ितने पर तोले हैं

इन रातों को हरीम-ए-नाज़ का इक आलम होये है नदीम
खल्वत में वो नर्म उंगलियां बंद-ए-क़बा जब खोले हैं

ग़म का फ़साना सुनने वालों आखिर-ए-शब आराम करो
कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे हम भी ज़रा अब सो ले हैं

हम लोग अब तो पराये से हैं कुछ तो बताओ हाल-ए-“फ़िराक़”
अब तो तुम्हीं को प्यार करे हैं अब तो तुम्हीं से बोले हैं


ग़ज़ल - किसी का यूँ तो हुआ
गायक - जगजीत सिंह



किसी का यूं तो हुआ कौन उम्रभर फिर भी
ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोखा है सब मगर फिर भी

हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
नई नई सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी

तेरी निगाह से बचने में उम्र गुज़री है
उतर गया रग-ए-जां में ये नेशतर फिर भी




ग़ज़ल - ग़ज़ल का साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात
गायक - जगजीत सिंह


ग़ज़ल का साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात
नवा-ए-मीर सुनाओ बड़ी उदास है रात

नवा-ए-दर्द में इक ज़िंदगी तो होती है
नवा-ए-दर्द सुनाओ बड़ी उदास है रात

उदासियों के जो हमराज़-ओ-हमनफ़स थे कभी
उन्हें ना दिल से भुलाओ बड़ी उदास है रात

जो हो सके तो इधर की राह भूल पड़ो
सनमक़दे की हवाओं बड़ी उदास है रात

कहें न तुमसे तो फ़िर और किससे जाके कहें
सियाह ज़ुल्फ़ के सायों बड़ी उदास है रात

अभी तो ज़िक्र-ए-सहर दोस्तों है दूर की बात
अभी तो देखते जाओ बड़ी उदास है रात

दिये रहो यूं ही कुछ देर और हाथ में हाथ
अभी ना पास से जाओ बड़ी उदास है रात

सुना है पहले भी ऐसे में बुझ गये हैं चिराग़
दिलों की ख़ैर मनाओ बड़ी उदास है रात

समेट लो कि बड़े काम की है दौलत-ए-ग़म
इसे यूं ही न गंवाओ बड़ी उदास है रात

इसी खंडहर में कहीं कुछ दिये हैं टूटे हुए
इन्ही से काम चलाओ बड़ी उदास है रात

दोआतिशां न बना दे उसे नवा-ए-‘फ़िराक़’
ये साज़-ए-ग़म न सुनाओ बड़ी उदास है रात